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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का धरना जारी: मतदाता सूची से नाम हटाने पर राजनीतिक घमासान, भाजपा पर 'बंगाल को बांटने' का आरोप
कोलकाता - पश्चिम बंगाल की राजनीतिक धुरी एक बार फिर कोलकाता के एस्प्लेनेड मेट्रो चैनल पर केंद्रित हो गई है, जहां मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने राज्य की मतदाता सूची से लाखों नामों को हटाने के विरोध में अपना धरना दूसरे दिन भी जारी रखा है। शुक्रवार की रात उन्होंने धरना स्थल पर ही बिताई, जो उनके दृढ़ संकल्प और इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है। 6 मार्च को दोपहर 2 बजे शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन, राज्य में आगामी चुनावों से पहले एक बड़े राजनीतिक टकराव का संकेत दे रहा है।
ममता बनर्जी ने इस 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR)' प्रक्रिया को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि मतदाता सूची से नामों को हटाना 'बंगाल को बांटने' और यहां के मतदाताओं को उनके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करने की एक सुनियोजित साजिश है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि भाजपा बंगाल को धार्मिक और भाषाई आधार पर विभाजित कर वोट छीनने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा नेता अन्य राज्यों में बंगाली भाषी लोगों को परेशान कर रहे हैं और उन्हें मताधिकार से वंचित करने की साजिश रच रहे हैं, जिससे बंगाली पहचान और अधिकारों पर हमले का नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है।
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आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 28 फरवरी को जारी अंतिम मतदाता सूची में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। पिछले साल नवंबर में SIR प्रक्रिया शुरू होने के बाद से लगभग 63.66 लाख नाम, जो कुल मतदाताओं का लगभग 8.3% है, सूची से हटा दिए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप, राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 7.04 करोड़ रह गई है। यह संख्या दिसंबर में जारी मसौदा सूची में हटाए गए 58 लाख से अधिक नामों से भी अधिक है, जो इस प्रक्रिया की व्यापकता को दर्शाता है।
इस प्रक्रिया का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 60.06 लाख से अधिक मतदाताओं को 'अंडर एडजुडिकेशन' श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि उनकी पात्रता अभी तक तय नहीं हुई है और आने वाले हफ्तों में कानूनी जांच के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि इन मतदाताओं की अंतिम स्थिति कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी समीकरणों को नाटकीय रूप से बदल सकती है, जिससे पार्टियों की रणनीति और भी जटिल हो जाएगी। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का भविष्य अधर में लटकना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विधायक और पार्टी कार्यकर्ता धरना स्थल पर मुख्यमंत्री के साथ एकजुटता दिखाने के लिए मौजूद हैं, जो इस मुद्दे पर पार्टी की मजबूती को दर्शाता है। यह धरना केवल मतदाता सूची से नामों को हटाने के विरोध में नहीं है, बल्कि यह भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच चल रहे राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का भी एक हिस्सा है, खासकर जब राज्य में पंचायत चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। ममता बनर्जी ने इस दौरान एक महत्वपूर्ण घोषणा भी की, जिसमें उन्होंने 10वीं पास बेरोजगार युवाओं को 1500 रुपये प्रति माह देने का वादा किया। यह घोषणा उनके विरोध प्रदर्शन को सामाजिक-आर्थिक आयाम भी देती है, जिसका उद्देश्य युवाओं को आकर्षित करना है।
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निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया का उद्देश्य हमेशा त्रुटियों को दूर करना और एक सटीक तथा अद्यतन मतदाता सूची तैयार करना होता है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में नामों को हटाना और 'अंडर एडजुडिकेशन' श्रेणी में रखना पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि इस मुद्दे पर ममता बनर्जी का आक्रामक रुख उनकी पार्टी के लिए एक मजबूत चुनावी मुद्दा बन सकता है, जिससे वे बंगाली पहचान और अधिकारों के संरक्षक के रूप में खुद को स्थापित कर सकेंगी। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह धरना और इससे उपजा राजनीतिक विवाद पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।