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ईरान ने अमेरिका की 'आक्रामक और धमकी भरी कार्रवाइयों' को किया खारिज, तुर्की ने बढ़ाई राजनयिक पहल

ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियान ने अमेरिका के साथ सफल कूटनीति क

ईरान ने अमेरिका की 'आक्रामक और धमकी भरी कार्रवाइयों' को किया खारिज, तुर्की ने बढ़ाई राजनयिक पहल
Ekhbary Editor
1 day ago
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भारत - इख़बारी समाचार एजेंसी

ईरान ने अमेरिका की 'आक्रामक और धमकी भरी कार्रवाइयों' को किया खारिज, तुर्की ने बढ़ाई राजनयिक पहल

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ कूटनीति की सफलता के लिए 'धमकी भरे आचरण' को समाप्त करने पर जोर दिया है, विशेष रूप से खाड़ी क्षेत्र में वाशिंगटन की भारी सैन्य तैनाती के संदर्भ में। राष्ट्रपति का यह बयान क्षेत्र में बढ़ते तनाव और ईरान व अमेरिका के बीच दशकों पुराने जटिल संबंधों को रेखांकित करता है। यह एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर आया है जब क्षेत्रीय स्थिरता के लिए राजनयिक प्रयासों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है, और तुर्की जैसे क्षेत्रीय शक्तियां इन प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।

पेज़ेशकियान का यह स्पष्ट संदेश ईरान की उस नीति का प्रतिबिंब है जो बाहरी दबाव और सैन्य धमकियों के बीच अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय हितों की रक्षा करना चाहती है। खाड़ी में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को ईरान अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता रहा है, जबकि अमेरिका का दावा है कि उसकी उपस्थिति क्षेत्रीय सहयोगियों की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। इन विरोधाभासी दृष्टिकोणों ने अक्सर क्षेत्र को एक नाजुक संतुलन में रखा है, जहां किसी भी पक्ष की छोटी सी गलती बड़े संघर्ष का कारण बन सकती है। ईरान के राष्ट्रपति का यह बयान, अमेरिका की 'आक्रामक और धमकी भरी कार्रवाइयों' को सीधे तौर पर खारिज करते हुए, तेहरान की ओर से एक स्पष्ट संकेत है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन केवल सम्मान और समान शर्तों पर। यह दर्शाता है कि ईरान किसी भी ऐसे राजनयिक प्रयास का स्वागत करेगा जो पारस्परिक सम्मान और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों पर आधारित हो।

ऐतिहासिक रूप से, ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंध 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से तनावपूर्ण रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम, मानवाधिकार, और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद हैं। संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA), जिसे आमतौर पर ईरान परमाणु समझौते के रूप में जाना जाता है, ने कुछ समय के लिए तनाव कम किया था, लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे हटने के बाद स्थिति फिर से बिगड़ गई। समझौते से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद, ईरान ने भी धीरे-धीरे अपनी परमाणु गतिविधियों को बढ़ाना शुरू कर दिया, जिससे पश्चिमी देशों की चिंताएं बढ़ गईं। इस पृष्ठभूमि में, खाड़ी में सैन्य तैनाती को ईरान एक उत्तेजक कार्रवाई के रूप में देखता है, जो कूटनीति के लिए अनुकूल माहौल को बाधित करती है।

राष्ट्रपति पेज़ेशकियान का पदभार संभालना ईरान की घरेलू और विदेश नीति के लिए एक नया अध्याय खोलता है। उनके पूर्ववर्ती, इब्राहिम रायसी की दुखद मृत्यु के बाद, पेज़ेशकियान ने एक मध्यममार्गी नेता के रूप में अपनी छवि बनाई है, जो घरेलू सुधारों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संतुलन की वकालत करते हैं। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि ईरान एक ओर अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए दृढ़ है, वहीं दूसरी ओर वह रचनात्मक कूटनीति के दरवाजे खुले रखना चाहता है। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे बनाए रखना किसी भी ईरानी नेता के लिए एक बड़ी चुनौती रही है।

इस जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में, तुर्की ने खुद को एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया है। तुर्की, जो ईरान और अमेरिका दोनों के साथ अपने संबंध साझा करता है, ने अक्सर क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने में एक पुल की भूमिका निभाई है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन और उनके राजनयिक दल ने विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संवाद को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम किया है। तुर्की की भू-रणनीतिक स्थिति और इसकी मजबूत सैन्य व आर्थिक क्षमता इसे एक अद्वितीय स्थिति में रखती है ताकि यह तनाव कम करने और बातचीत के लिए मंच तैयार करने में मदद कर सके। तुर्की की राजनयिक पहल केवल ईरान और अमेरिका तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें इराक, सीरिया, और अन्य खाड़ी देशों के साथ भी सक्रिय जुड़ाव शामिल है, जो क्षेत्र में शांति और स्थिरता लाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

तुर्की के राजनयिक प्रयासों का उद्देश्य न केवल ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को कम करना है, बल्कि क्षेत्र में अन्य संघर्षों, जैसे कि यमन और सीरिया में, के समाधान के लिए भी एक मार्ग प्रशस्त करना है। तुर्की का मानना है कि क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता तभी प्राप्त की जा सकती है जब सभी हितधारक एक मेज पर आएं और आपसी सम्मान के साथ मुद्दों को हल करें। इस संदर्भ में, तुर्की की भूमिका एक तटस्थ सुविधाप्रदाता की है, जो दोनों पक्षों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने और सामान्य आधार खोजने में मदद कर सकता है। तुर्की की यह कूटनीति उसकी 'शून्य समस्या' नीति का विस्तार है, जिसका उद्देश्य पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाना है, हालांकि व्यवहार में यह हमेशा आसान नहीं रहा है।

ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशकियान का बयान और तुर्की के राजनयिक प्रयास एक साथ मिलकर एक ऐसे समय में आशा की किरण जगाते हैं जब मध्य पूर्व में अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। खाड़ी क्षेत्र, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है, में किसी भी बड़े संघर्ष के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर परिणाम होंगे। इसलिए, राजनयिक समाधान खोजना न केवल क्षेत्रीय शक्तियों के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक प्राथमिकता है। ईरान के राष्ट्रपति का यह आह्वान कि अमेरिका 'धमकी भरा आचरण' समाप्त करे, यह दर्शाता है कि ईरान बातचीत के लिए एक सम्मानजनक और गैर-टकरावपूर्ण माहौल चाहता है। यह एक महत्वपूर्ण शर्त है जिस पर भविष्य की कूटनीति की सफलता निर्भर करेगी।

आगे की राह चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका और ईरान के बीच विश्वास का अभाव गहरा है, और इसे रातोंरात दूर नहीं किया जा सकता। किसी भी सफल कूटनीति के लिए समय, धैर्य और दोनों पक्षों की ओर से वास्तविक प्रतिबद्धता की आवश्यकता होगी। तुर्की जैसे मध्यस्थों की भूमिका इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय वाशिंगटन और तेहरान को ही लेना होगा। यह देखना बाकी है कि क्या पेज़ेशकियान का कार्यकाल ईरान को अमेरिका के साथ संबंधों में एक नई दिशा दे पाएगा और क्या तुर्की के राजनयिक प्रयास इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक साबित होंगे। क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस प्रक्रिया का बारीकी से पालन करना होगा और सभी पक्षों को तनाव कम करने और शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।

इस पूरे प्रकरण में, ईरान के आंतरिक राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। पेज़ेशकियान को न केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना होगा, बल्कि देश के भीतर विभिन्न गुटों, विशेष रूप से कट्टरपंथियों, के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ सकता है जो अमेरिका के साथ किसी भी तरह के समझौते के प्रति संशयवादी हैं। इसलिए, उनकी कूटनीतिक पहल की सफलता काफी हद तक उनकी घरेलू राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की क्षमता पर भी निर्भर करेगी। यह एक जटिल नृत्य है जिसमें क्षेत्रीय और वैश्विक खिलाड़ियों की भूमिकाएं लगातार बदलती रहती हैं, लेकिन मूल उद्देश्य हमेशा स्थिरता और शांति प्राप्त करना ही रहता है।